Sunday, October 20, 2024

माली का मन उतर गया रे.....

कविता - माली का मन उतर गया रे.....

कितनी उम्मीदें पाली थी रे उसने अपने उपवन से
 माली का मन उतर गया रे इस प्यारे से गुलशन से!

उसने सींचा खून पसीना स्वजीवन के कण कण से
 उसने सेवा भी कर डाली अपने तन मन और धन से
 हमने यह क्या कर डाला रे जो हार गया वो इस क्षण से 
माली का मन उतर गया रे इस प्यारे से गुलशन से।

टुकड़े-टुकु‌ड़े विखर गये तो फिर कब हम मिल पायेगें।
 'आय लुटेरा लुटेगा क्या फिर भी हम मौज मनायेगें
 अरे सोच लो क्या लेकर जाना है इस जीवन से
 माली का मन उतर गया रे इस प्यारे से गुलशन से।।

देखों अपनी ताकत को और अभी यहीं पहचान लो
 नही तुम्हारें जो हितकारी उसे अभी से जान लो
 हम सब एक रहेगें सदा ही कह दो अपने इस मन से
 माली का मन उतर गया रे इस प्यारे से गुलशन से।

28/09/2008
कोटा

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